दुनिया भर में नॉमिनल जीडीपी में किसी झूठ या फ्रॉड की गुंजाइश नहीं क्योंकि वो बाज़ार मूल्यों पर आधारित होता है और बाज़ार मूल्य अमूमन झूठ नहीं बोलते। मई 2014 से पहले भारत में भी ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी। तब औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) जैसे मात्रा पर आधारित सूचकांकों से रीयल जीडीपी की गणना सीधे की जाती थी और फिर उसमें डिफ्लेटर जोड़कर नॉमिनल जीडीपी निकाला जाता था। लेकिन मोदी सरकार ने जनवरी 2015 से जीडीपीऔरऔर भी

देश के आम से लेकर खास लोग और दिहाड़ी मजदूर से लेकर कॉरपोरट तक हम सभी रोजमर्रा के जीवन में जो देखते, समझते, झेलते, भोगते व महसूस करते हैं, वो नॉमिनल जीडीपी और उसकी विकास दर में ही झलकता है। हालांकि दुनिया भर में इसे मुद्रास्फीति-निरपेक्ष बनाने के लिए डिफ्लेटर का इस्तेमाल कर रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर निकाली जाती है। लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखें कि रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर मूलतःऔरऔर भी

ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन। भारत ने चौथी बार इसकी अध्यक्षता की। इसके पांच मूल सदस्यों – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका में भारत सबसे गरीब है। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2550 डॉलर है, जबकि दक्षिण अफ्रीका की 6110 डॉलर, ब्राज़ील की 9930 डॉलर, चीन की 13,660 डॉलर और रूस की 15,160 डॉलर है। विश्व बैंक के जुलाई 2026 के ताजा मानक के मुताबिक 14,375 डॉलर या अधिक प्रति व्यक्ति वाला देश विकसित है, जबकिऔरऔर भी

देश का जीडीपी महज संख्याओं का खेल नहीं। हर देशवासी के साथ उद्योग-धंधों, व्यापार और सरकारों तक की हरकतों से इसका वास्ता है। इसके सारे घटकों को डेटा सर्वसुलभ और पारदर्शी हो तो इसका हिसाब निकालना कोई रॉकेट साइंस नहीं। किसी अवधि में घरों से लेकर बिजनेस तक जो भी माल व सेवाएं सृजित हुई हैं, उसमें सरकार को मिला टैक्स जोड़कर उसके द्वारा दी गई सब्सिडी घटा दें तो जीडीपी निकल आता है। इसका एक स्वरूपऔरऔर भी

यह वाकई बड़े अचम्भे की बात है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में नॉमिनल जीडीपी पुरानी सीरीज में ₹86,05,365 करोड़ था, जबकि रीयल जीडीपी ₹47,88,623 करोड़ था। आखिर डेरिवेटिव या निकाला गया रीयल जीडीपी बाज़ार मूल्य के नॉमिनल जीडीपी से 44.35% कम क्यों? मुद्रास्फीति को बेअसर करने का यह कैसा डिफ्लेटर था जिसने गुब्बारे की 44.35% हवा निकाल दी थी? सरकारी अर्थशास्त्रियों व आर्थिक विश्लेषकों की जमात इतने बड़े अंतर का रहस्य खोलने के बजाय तंजऔरऔर भी

मोदी सरकार जीडीपी को चमकाने के लिए सालों-साल से बड़े योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 करना तय था। इसलिए उसने 2022-23 का जीडीपी जितना कम किया जा सकता था, उतना कम किया ताकि उसके आधार पर आगे अधिक वृद्धि दर दिखाई जा सके। वित्त वर्ष 2022-23 में नॉमिनल जीडीपी शुरू में ₹2,72,40,712 करोड़ आंका गया। फिर इसे घटाकर ₹2,68,90,473 करोड़ किया गया। फरवरी 2026 मेंऔरऔर भी

बाज़ार में मूल्य समय के साथ बाद में घट-बढ़ सकते हैं। लेकिन एक बार बाज़ार के किसी मूल्य पर समय का ठप्पा लग गया तो उसे बाद की किसी तारीख में संशोधित करके घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। मान लीजिए कि आपने जून 2025 में एक किलो घी 500 रुपए में खरीदा। जून 2026 में उसी घी के दाम 550 रुपए हो गए तो 10% की बढ़ोतरी हो गई। ऐसा हो नहीं सकता कि घी का जो बाज़ारऔरऔर भी

किन्ने कहा किन्ने कहा, बब्बन हज्जाम ने कहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की आलोचनाओं की ठीकरा नाराज़ फूफाओं पर फोड़ने में लगे हैं। लेकिन इससे पहले ही मोदी सरकार में जुलाई 2017 से जुलाई 2019 तक दो साल वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलात से लेकर वित्त सचिव जैसे शीर्ष पदों पर रहे सुभाष चंद्र गर्ग ने बब्बन हज्जाम बनकर उनकी ऐसी पोल-पट्टी खोली कि हंगामा बच गया। मोदी सरकार का दिखाने का अंतिम दांत जीडीपी काऔरऔर भी

हफ्ते के पहले दिन सोमवार को घोषित हुआ कि देश के जीडीपी की रीयल या सच्ची विकास दर, महंगाई के असर को खत्म करने के बाद 7.8% रही है। मतलब भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया के संकट के बावजूद बमबम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसे निजी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे है। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार मायूसी में जकड़ा रहा। हफ्ते के आखिरी ट्रेडिंग दिन, शुक्रवार तक निफ्टी-50 सूचकांक सोमवार के 24,080.40 सेऔरऔर भी