मोदी सरकार यह मानने को तैयार नहीं कि उसने भारत की विकासगाथा का अंत कर दिया है। उसके लिए कॉरपोरेट क्षेत्र का मतलब अडाणी, अंबानी व चंद उद्योगपति है। आत्मनिर्भर भारत का नारा और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को पूरी तरह चीन पर निर्भर बना दिया। ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लगता है कि शेयरों पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स घटा दो और इसकी गणना रुपए के बजाय डॉलर में करने लगो तो भारतीय बाज़ार से विदेशीऔरऔर भी

विचित्र पैराडॉक्स! देश का जीडीपी 7.8% बढ़ रहा है। लेकिन सितंबर तिमाही में मारुति का लाभ 26% गिरा, सिप्ला के शुद्ध लाभ में 35% कमी और एसीसी का मुनाफा घटती बिक्री के बीच 92% डूब गया। यह सैम्पल अपवाद नहीं, हकीकत है। लेकिन फाइनेंस के दिग्गज़ अर्थव्यवस्था का यह सच गले से नीचे उतारने को तैयार नहीं। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी के सीआईओ शंकरन नरेन कहते हैं कि समस्या दुनिया में चल रहे युद्ध और कच्चे तेल केऔरऔर भी

देशी निवेशक संस्थाएं (डीआईआई) बराबर शेयर बाज़ार में खरीदे जा रही हैं। लेकिन विदेशी निवेशकों के साथ ही रिटेल निवेशक भी अब बेच-बाचकर निकल रहे हैं तो इसकी मूल वजह यह है कि भारत की विकासगाथा पर उनका भरोसा तार-तार हो चुका है। भारतीय कंपनियों के प्रवर्तक भी अपनी शेयरधारिता बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं। निफ्टी-50 सूचकांक में शामिल निजी क्षेत्र की कंपनियों के प्रवर्तकों की इक्विटी हिस्सेदारी मार्च 2024 के 29.8% से घटकर जून 2026 तकऔरऔर भी

दो साल से भारतीय शेयर बाज़ार की वाट लगी हुई है। जिन दो सालों में दक्षिण कोरिया का कम्पोजिट सूचकांक 114.9%, ब्राज़ील का बोवेस्पा सूचकांक 57.9%, अमेरिका का एस एंड पी 500 सूचकांक 31.3%, लंदन का फुटसी सूचकांक 29.3% और हांगकांग का हैंगसेंग सूचकांक 12.2% बढ़ा है, उन्हीं दो सालों में हमारा निफ्टी-50 सूचकांक 6.3% गिरा है। इस साल हैंगसेंग सूचकांक 12.3% गिरा है, जबकि बाकी चार सूचकांक 7.4% से 28.8% तक बढ़े हैं। मगर इस सालऔरऔर भी

सम्राट अकबर के दरबार में नौ ही रत्न थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दरबारी मंत्रियों के रूप में 69 रत्न भर रखे हैं। सभी नायाब, एक से बढ़कर एक। इन्हीं रत्नों या कहें तो महारत्नों में से एक हैं उनकी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। मई 2019 से देश की वित्त मंत्री हैं और अब तक लगातार नौ बजट पेश कर चुकी हैं। वे अपने ‘संजीदा’ बयानों से हर देशवासी की बोलती बंद करतीऔरऔर भी

जबरदस्त हताशा व निराशा का आलम है। वजह चाहे जो भी हो, कच्चे तेल का 114 प्रति डॉलर पर पहुंच जाना, भारतीय शेयर बाज़ार का मूल्यांकन या मार्जिन ट्रेड के सौदों को समेटने का दबाव। अब तो लार्जकैप से कहीं ज्यादा मार स्मॉलकैप और मिडकैप स्टॉक्स पर पड़ रही है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को निफ्टी-50 सूचकांक 0.39% ही घटा, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 सूचकांक 2.94% और मिडकैप-100 सूचकांक 2.21% गिर गया। अभी तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हीऔरऔर भी

भारत के जन-जन, बच्चे से लेकर बूढ़े व भिखारी तक प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स राजस्व सरकार को देते हैं। टैक्स से बनी आस्तियां बेचकर सरकार अतिरिक्त धन जुटाती है। जन-जन की जमा और बचत से ही वो 99% ऋण हासिल करती है। यही नहीं, देश के बाहर कमाने गए अनिवासी भारतीय (एनआरआई) अगर विदेशी मुद्रा भेजना बंद करें तो भारत सरकार भयंकर भुगतान संतुलन के संकट में फंस सकती है। सरकार ने जो नीतियां बना रखी हैं,औरऔर भी

बाज़ार से ₹16-17 लाख करोड़ का उधार लेना कोई मामूली बात नहीं। सरकार मार्च 2027 तक बाज़ार से इसमें से ₹7.86 लाख करोड़ जुटाएगी। पहले सरकार ने कब बाज़ार से लोन उठाया, पता ही नहीं चलता था। वित्त वर्ष 2011-12 तक बैंक सरकारी ऋणों का 44.2% हिस्सा सोख लेते थे जो जीडीपी का 25.1% था। तब रिजर्व बैंक ने सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) 40% बना रखा था। इसके चलते बैंकों को अपनी कुल जमा का कम सेऔरऔर भी

भारत सरकार को सारे का सारा टैक्स हम करीब 146 करोड़ देशवासी देते हैं। इनकम टैक्स से लेकर जीएसटी और एक्साइज व कस्टम ड्यूटी तक के रूप में। यहां तक कि जो सरकारी योजनाओं के करोड़ों लाभार्थी हैं वे भी सरकार को टैक्स देते हैं। टैक्स में प्रत्यक्ष और परोक्ष का भेद करना सरकार की चाल है। साथ ही कमाल की बात है कि सरकार अपना तकरीबन सारा ऋण सीधे या घुमा-फिराकर भी हम से ही लेतीऔरऔर भी

हर देशवासी के लिए जानना ज़रूरी है कि सरकार जो प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स लेती है और उसके ऊपर देश के नाम पर जो कर्ज लेती है, उसका वो करती क्या है? हर साल बजट में इसकी जानकारी होती है। लेकिन एक तो हम उस पर ध्यान नहीं देते। दूसरे वो इतनी उलझी होती है कि बड़े-बड़े जानकारों के लिए उसे तार-तार कर समझना मुश्किल है। फिर भी हम कोशिश करें तो उलझे तारों को सुलझा सकतेऔरऔर भी