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11594.45 11645.95 11564.80 11575.95 11545/11635

 

रिश्वत के बोल, लेकिन वोट अनमोल

Apr 072019
 

बंद है मुठ्ठी तो लाख की, खुल गई तो फिर खाक की। उंगली पर जब तक काली स्याही का निशान न लगे, तब तक सरकार में बैठी और उससे बाहर की पार्टियां उसकी कीमत लगा रही हैं। एक बार निशान लग गया, फिर पांच साल तक कौन पूछनेवाला! अभी गिनने को है कि 90 करोड़ मतदाता, जिसमें से 50 करोड़ युवा मतदाता और उसमें से भी 15 करोड़ ऐसे जिन्होंने पिछले पांच सालों में मतदाता बनने का हक हासिल किया है। बाद में सब भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे, जिन्हें उनकी किस्मत और सरकारी नीतियों के भरोसे आवारा भटकने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

इसलिए मौका तभी तक है जब तक राजनीति खुद चलकर हमारे पास आई है। आम चुनावों की तैयारी में सरकार ने इस साल के बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना पेश कर दी जिसमें देश में 5 एकड़ तक की जोतवाले 12 करोड़ किसानों को साल भर में तीन किश्तों में 6000 रुपए दिए जाएंगे। सरकार का दावा है कि इसकी 2000 रुपए की पहली किश्त दी जा चुकी है। फिर जैसे ही चुनावों का माहौल गरमाया, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यूनतन आय योजना (न्याय) घोषित कर दी। उन्होंने गारंटी दी कि कांग्रेस की सरकार बनने पर देश के 20 प्रतिशत सबसे गरीब परिवारों को हर महीने 6000 रुपए दिए जाएंगे। इस तरह देश के पांच करोड़ निर्धनतम परिवारों को साल भर 72,000 रुपए दिए जाएंगे।

पहले ने आखिरी वक्त पर साल में 6000 रुपए देने का आगाज़ किया तो दूसरे ने हर महीने 6000 रुपए देने की मुनादी कर दी। पहले का 2000 रुपए मिल गया। दूसरा सरकार बनाते ही न्याय योजना को लागू करने ऐलान कर देगा। दोनों ही आधिकारिक घोषणाएं हैं। अनधिकारिक स्तर पर क्या चल रहा है? जाति, धर्म व सम्प्रदाय की मंडियों में भावनाओं का नशा बांटा जा रहा है। मैं राष्ट्रभक्त, तू राष्ट्रद्रोही की तुरही बजाई जा रही है। इससे अलग गावों व मोहल्लों में, झुग्गियों व गरीब बस्तियों में दारु व नोट बांटने की तैयारी हो चुकी है। सवाल उठता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राजनेता और राजनीतिक पार्टियां मतदाता को इतना कमज़ोर क्यों समझती हैं कि उन्हें आसानी से खरीदा जा सकता है? आखिर चुनाव नतीजों के बाद मतदाता की समझ और जनादेश का सम्मान करनेवाले चुनावों से ठीक पहले उन्हें इतना नासमझ व बिकाऊ क्यों समझते हैं?

कौन नहीं जानता कि तपते रेगिस्तान में एक गिलास या एक मटके पानी का कोई मतलब नहीं होता। जहां करोड़ों किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई हो और वे अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हों, वहां 6000 रुपए की रिश्वत उनका वोट भले खरीद लें, लेकिन उनका संकट नहीं दूर सकती। जहां अब तक की भूख व गरीबी मिटाने की सारी योजनाएं भ्रष्टाचार का परनाला बन चुकी हों, वहां साल के 72,000 रुपए कहां बह जाएंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा। फिर भी संभव है कि रिश्वतखोरी मानने के बावजूद हम इन राजनीतिक बहेलियों के जाल में फंस जाएं क्योंकि अभी तक हमने अपने मतदाता होने और इनके राजनेता होने का मायने और मूल्य ठीक से नहीं समझा है।

हम नेता को अपना आका या पट्ठा समझते हैं। बहुत हुआ तो राजनीति हमारे लिए बॉक्सिंग का ऐसा मुकाबला है जिसमें हम किसी एक के साथ जुड़कर परपीड़ा का आनंद लेते हैं। हम नहीं समझते कि राजनेता हमारा नुमाइंदा है जिसे हमारी उन सामूहिक समस्याओं को हल करना है जिनके लिए हमारे पास न तो वक्त है और न ही ऊर्जा। हम यह भी नहीं समझते कि हम पान, बीड़ी, सिगरेट, नमक, तेल व कपडे-लत्ते से लेकर मोबाइल जैसी तमाम वस्तुओं व सेवाओं पर जो खर्च करते हैं, उससे अकेले केंद्र सरकार को साल में करीब 6.50 लाख करोड़ रुपए का टैक्स मिलता है। इसके अलावा साल भर में ढाई लाख से ज्यादा कमानेवाले 5.25 लाख करोड़ रुपए का इनकम टैक्स देते हैं। ऊपर से कंपनियों सरकार को सालाना 6.50 लाख करोड़ से ज्यादा का टैक्स देती हैं। बीते वित्त वर्ष 2017-18 में केंद्र को मिले टैक्स की कुल रकम 22.48 लाख करोड़ रुपए बनी थी। नए वित्त वर्ष 2019-20 में टैक्स की कुल रकम 25.52 लाख करोड़ रुपए हो जाने का अनुमान है।

सरकार टैक्स से मिले इस धन के ऊपर बाज़ार से उधार भी जुटाती है। टैक्स और सरकारी उधार को मिलाकर बनता है जनधन, जिसको खर्च करने का पूरा अधिकार सांसदों के बहुमत से बनी सरकार को मिल जाता है। मसलन, चालू वित्त वर्ष 2019-20 का बजट 27,84,200 लाख करोड़ रुपए का है। इसका एक प्रतिशत कट या कमीशन 27,842 करोड़ रुपए बनता है जिसे सांसदों की कुल संख्या (लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 245) से भाग दे दें तो प्रति सांसद सालाना 35 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम बनती है।

जनधन की यही अपार दौलत और उसमें कट पाने का लालच हमारे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को मतदाताओं को बरगलाने के लिए कुछ भी करने की इजाज़त दे देता है। हम अगर चेत जाएं तो जनधन की इस लूट को फौरन रोक सकते हैं और राजनीतिक पार्टियों से लेकर सरकार तक को ऐसी नीतियां बनाने को मजबूर कर सकते हैं जिससे व्यापक अवाम के रोज़ी-रोजगार की व्यवस्था हो सके। तब हमारे वोटों को कोई भी सरकारी या गैर-सरकारी रिश्वत कभी खरीद नहीं पाएगी।

(यह लेख दैनिक जागरण के 7 अप्रैल 2019 के अंक में मुद्दा पेज पर छप चुका है)

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