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इनकी बात

किसी खास हस्ती के रोचक विचार

Jan 052012
 

।।मनमोहन सिंह।। संस्‍कृत भारत की आत्‍मा है। संस्‍कृत विश्‍व की प्राचीनतम जीवित भाषाओं में से एक है। लेकिन प्रायः इसके बारे में गलत धारणा है कि यह केवल धार्मिक श्‍लोकों और अनुष्ठानों की ही भाषा है। इस प्रकार की भ्रांति न केवल इस भाषा की महत्‍ता के प्रति अन्‍याय है, बल्कि इस बात का भी […]

Mar 032011
 

।।प्रणव मुखर्जी।। भारत आज उस मुकाम पर है जहां कुछ भी करना या पाना असंभव नहीं लगता। साथ ही बहुत सारी चुनौतियां भी हमारे सामने हैं जिन्हें सुलझाकर ही हमने इस दशक के अंत तक विकसित देश के रूप में उभर सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है युवा भारत की बढ़ती अपेक्षाएं। यह आबादी […]

Jul 042010
 

अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को कायदे से कर्ज मिलता रहे, इसके लिए रिजर्व बैंक 1980 के दशक के आखिर-आखिर तक बैंकों द्वारा दिए जानेवाले उधार की मात्रा से लेकर उसकी ब्याज दर तक पर कसकर नियंत्रण रखता था। 1990 में दशक के शुरुआती सालों में वित्तीय क्षेत्र के सुधारों के तहत वाणिज्यक बैंकों की उधार […]

Jul 042010
 

वित्तीय समावेश क्यों महत्वपूर्ण है? सीधी-सी बात कि यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह बराबरी वाले विकास को लाने और टिकाए रखने की आवश्यक शर्त है। ऐसे बहुत ही कम दृष्टांत हैं जब कोई अर्थव्यवस्था कृषि प्रणाली से निकलकर उत्तर-औद्योगिक आधुनिक समाज तक व्यापक आधारवाले वित्तीय समावेश के बिना पहुंची हो। हम सभी अपने निजी […]

May 022010
 

किसी भी पैमाने से देखें तो देश में अभी चल रही मुद्रास्फीति की दर काफी ज्यादा है। यह चिंता की बात है क्योंकि इससे एक नहीं, कई तरह की दिक्कतें पैदा होती हैं। खासकर आबादी के बड़े हिस्से के लिए जिसके पास इसके असर को काटने के लिए कोई उपाय नहीं है। पहली बात कि […]

Apr 042010
 

पिछले दो सालों से दुनिया भर की सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए मुसीबत बना संकट अब लगभग मिट चुका है। अब हमें उन चुनौतियों पर ध्यान देने की जरूरत है जिनसे हमें आगे के सालों में जूझना है। तय-सी बात है कि औद्योगिक देश अब धीमे विकास के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। […]

Mar 302010
 

इला पटनायक मुद्रास्फीति का बढ़कर दहाई अंक में पहुंच जाना चिंता का मसला है। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित यह दर अगले कुछ हफ्तों तक और बढ़ेगी। लेकिन उसके बाद यह घटेगी। हमारे नीति-नियामकों को ब्याज दर बढ़ाने से पहले यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। वैसे रिजर्व बैंक के नीतिगत उपाय अभी तक […]

Mar 292010
 

डॉ. डी सुब्बाराव दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जिसकी अर्थव्यवस्था वित्तीय बाजार की व्यापक पहुंच व विस्तार के बिना मजबूत और विकसित हुई हो। और, वित्तीय बाजार का ऐसा विस्तार तभी संभव है जब घर-परिवार व उसके सदस्य वित्तीय रूप से साक्षर हों और बचत से लेकर उधार लेने व निवेश करने के […]