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बैंकिंग उद्योग में ऐसा पहली बार हुआ है। आईडीबीआई बैंक ने चेक बाउंसिग के अलावा सेंविग्स और करंट एकाउंट से जुड़े सारे के सारे शुल्क खत्म कर दिए हैं। यह फैसला 1 सितंबर, बुधवार से लागू हो गया है। इसका मतलब यह होगा कि बैंक का कोई भी खाताधारी उससे डिमांड ड्राफ्ट बनवाएगा तो उसे [...]

 

खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अब स्वीकार कर लिया है कि पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार माल व सेवा कर (जीएसटी) को 1 अप्रैल 2011 से लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने बुधवार को मुंबई में इनकम टैक्स, कस्टम्स व सेंट्रल एक्साइज के चीफ कमिश्नरों और कमिश्नरों की बैठक को संबोधित करते हुए कहा, [...]

 

जितना बड़ा जोखिम, उतना बड़ा बीमा। दुनिया ने 1 सितंबर की तारीख को अब तक का सबसे बड़ा जोखिम झेला है क्योंकि दूसरा विश्व युद्ध 1 सितंबर 1939 को शुरू हुआ था। लेकिन देश में भी 1 सितंबर की तारीख और बीमा उद्योग के बीच गहरा रिश्ता है। 1 सितंबर 2000 को भारतीय बीमा उद्योग [...]

 

बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) ने 1 सितंबर 2010 से लागू नए नियमों को पूरा करनेवाले 51 यूलिप (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) उत्पाद मंजूर कर दिए हैं। इरडा के चेयरमैन जे हरिनारायण ने बुधवार को मुंबई में एसोचैम द्वारा आयोजित ग्लोबल इंश्योरेंस समिट में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके पास कुल 68 यूलिप [...]

 

देश में व्यावसायिक दुश्मनी के मामलों में इजाफा, कंपनियों को ग्रामीण व अशांत इलाकों में होनेवाली समस्याएं, अपहरण की बढ़ती वारदातों और भारतीय मालवाहक जहाजों को विदेशी समुद्री लुटेरों से पल-पल मंडराते खतरे के मद्देनजर आज के जमाने में अपहरण व फिरौती बीमा की जरूरत बढ़ने लगी है। और इस जरूरत को पूरा करती है [...]

 

बड़े अफसोस की बात है कि छोटे हमेशा छोटा ही रहना चाहते हैं और उनमें बड़ा, समझदार व जानकार बनने की कोई इच्छा नहीं है। वे अपना दायरा तोड़ने को तैयार नहीं हैं। अब भी निवेश करने से पहले रिसर्च की अहमियत नहीं समझते। हमने ओएनजीसी के 800 रुपए रहने पर अपनी रिपोर्ट आपको दी [...]

 

तलहटी पर खरीदने का अपना सुख होता है। हां, इस सुख में थोड़ा दुख तब हो जाता है जब शेयर अगले दिन या उसके अगले-अगले दिन नई तलहटी पकड़ लेता है। ऐसे में रणनीति थोड़ी-थोड़ी खरीद की होनी चाहिए। जितना गिरता जाए शेयर, हम खरीदते जाएं और इस तरह अपनी औसत लागत कम करते जाएं। [...]

 

हम सभी बचपन से लेकर बड़े होने तक सुरक्षा के आदी हो जाते हैं। बचपन में मां-बाप की सुरक्षा, बड़े होने पर नौकरी की सुरक्षा। लेकिन बहुत सारी अनुभूतियां सुरक्षा का दायरा तोड़े बिना नहीं मिलतीं और हम अधूरे रह जाते हैं।

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