थोड़े में संतोष करना उस जमाने की सोच है जब राजा दिग्विजय करता था और प्रजा के पांव बंधे थे। मजबूरी से उपजी उस सोच को आज ढोते रहने का कोई मतलब नहीं हैं। आज हम सभी राजा हैं तो खुद को बांधे क्यों?
थोड़े में संतोष करना उस जमाने की सोच है जब राजा दिग्विजय करता था और प्रजा के पांव बंधे थे। मजबूरी से उपजी उस सोच को आज ढोते रहने का कोई मतलब नहीं हैं। आज हम सभी राजा हैं तो खुद को बांधे क्यों?
रिजर्व बैंक ने साल 2010-11 में कागज के नोटों की छपाई पर कुल 2376 करोड़ रुपए खर्च किए। एक हज़ार का नोट छापने का कुल खर्च 3.17 रुपए आता है, जबकि पांच रुपए के नोट का खर्च 48 पैसे है। आनुपातिक रूप से पांच रुपए का नोट छापना सबसे महंगा है क्योंकि उसकी लागत अंकित मूल्य की 9.6 फीसदी है, जबकि यह अनुपात हज़ार रुपए के नोट के मामले में केवल 0.32 फीसदी है। देश में कागज के नोटों का सिलसिला 1862 से शुरू हुआ। 1935 में रिजर्व बैंक के गठन तक नोट एक रंग के और एक ही तरफ छपे होते थे।
कॉरपोरेट क्षेत्र में बहस छिड़ी है कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के लिए वरदान हैं या अभिशाप। देश की सबसे बड़ी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, एचडीएफसी के प्रमुख दीपक पारेख जैसे दिग्गज कहते हैं कि डॉ. सिंह के रूप में हमें अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री मिले हैं। वे एकदम बेदाग राजनेता हैं। इसलिए देश के वरदान हैं। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि डॉ. सिंह भले ही स्वच्छतम छवि के नेता हों, लेकिन [...]
अंदर की प्रकृति को बाहर की प्रकृति से मिला देना, प्रकृति के साथ एकाकार हो जाना ही लक्ष्य है। सत्ता और समाज अपने-आप में साध्य नहीं, बल्कि साधन हैं प्रकृति की विपुल संपदा में अपना हिस्सा पाने के।
समय के साथ चलो तो चीजें बड़ी स्थिर या धीमी दिखती हैं। कहीं कोई खटका नहीं। सब कुछ सामान्य गति से चलता है। लेकिन समय से पीछे छूट जाओ तो सब कुछ तेज़ी से भागता हुआ नज़र आता है।
।।मनमोहन सिंह।। संस्कृत भारत की आत्मा है। संस्कृत विश्व की प्राचीनतम जीवित भाषाओं में से एक है। लेकिन प्रायः इसके बारे में गलत धारणा है कि यह केवल धार्मिक श्लोकों और अनुष्ठानों की ही भाषा है। इस प्रकार की भ्रांति न केवल इस भाषा की महत्ता के प्रति अन्याय है, बल्कि इस बात का भी [...]
।।प्रणव मुखर्जी।। भारत आज उस मुकाम पर है जहां कुछ भी करना या पाना असंभव नहीं लगता। साथ ही बहुत सारी चुनौतियां भी हमारे सामने हैं जिन्हें सुलझाकर ही हमने इस दशक के अंत तक विकसित देश के रूप में उभर सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है युवा भारत की बढ़ती अपेक्षाएं। यह आबादी [...]
।।एस पी सिंह।। ध्वस्त राशन प्रणाली पर खाद्य सुरक्षा विधेयक का बोझ डालने का सीधा मतलब खाद्य सब्सिडी में दोगुनी लूट है। सरकार इसी मरी राशन प्रणाली के भरोसे देश की तीन चौथाई जनता को रियायती मूल्य पर अनाज बांटने का मंसूबा पाले बैठी है, जबकि उसी के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 60 फीसदी रियायती [...]
।।किशोर ओस्तवाल।। हमारे शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों को झांसा देने का काम आज से नहीं, दसियों साल से हो रहा है। यही वजह है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 35 फीसदी हिस्सा अब भी बचत के रूप में किनारे पड़ा हुआ है। क्यों? इसलिए कि रिटेल निवेशकों का पूंजी बाजार से [...]
कंपनी में चेयरमैन से ज्यादा अहमियत सीईओ की होती है। उसी तरह जैसे देश में राष्ट्रपति से ज्यादा अहमियत प्रधानमंत्री की होती है। कंपनी का सीईओ जो चाहे कर सकता है, हालांकि उसे निदेशक बोर्ड की मंजूरी लेनी पड़ती है। हमारा प्रधानमंत्री भी चाहे जो फैसले कर सकता है, हालांकि उसे पार्टी के हाईकमान और [...]
आप मानें या न मानें, हमारे पूरे हिंदी समाज में ज्ञान का डेफिसिट, ज्ञान का घाटा पैदा हो गया है। सरकार घाटे को उधार लेकर पूरा करती है। लेकिन ज्ञान का घाटा केवल उधार लेकर पूरा नहीं किया जा सकता। उधार के ज्ञान से प्रेरणा भर ली जा सकती है। उसका पुनर्सृजन तो अपने ही [...]
।।राकेश मिश्र।।* उदारवादी व्यवस्था में भारतीय राजस्व और अर्थशास्त्र के आज़ादी के पचास सालों में तैयार किए गए गहन मूलभूत सिद्धांतों और व्यवस्था के आधारभूत तत्वों को तथाकथित नए उदारवादी मानकों के अनुसार तय किया जाने लगा। यह दौर शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण के दूसरे चरण में 1998 के दौरान। इस दौर के अर्थशास्त्रियों की [...]
।।चंद्रभूषण।।* अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा, “बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन [...]
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