मई कैलेंडर

Jun 302012
 

आफतों को मानसून की तरह मौसम विभाग की भविष्यवाणी की कद्र नहीं। पता नहीं कि कब सिर उठाए चली आएं। आफतें मुंबई की बारिस भी नहीं कि आई और गायब। वे बरसती हैं ऐसी मूसलाधार कि तांता टूटता ही नहीं। लेकिन टूटेंगे हम भी नहीं। (more…)

Jun 272012
 

व्यक्तियों के मिलने से समुदाय या सम्प्रदाय बनते हैं, जबकि राष्ट्र का निर्माण संस्थाओं के बिना नहीं हो सकता है। समुदाय या सम्प्रदाय तात्कालिक हितों पर आधारित होते हैं, जबकि संस्थाओं के पीछे दीर्घकालिक हित काम करते हैं। (more…)

Jun 262012
 

जिस तरह कोयल के अंडे को कौआ अपना समझकर सेता रहता है। उसी तरह हम दूसरों की चिंताओं को अपने सिर ओढ़ लेते हैं। सरकार से लेकर प्रभुवर्ग अपनी चिंताओं को सबकी चिंताएं बनाकर पेश कर देते हैं और हम भी मर्सिया गाने लगते हैं। (more…)

Jun 252012
 

मित्रों! तैयारी जारी है। जल्दी ही हम फिर से आपके बीच इस कॉलम में निवेश की सलाह लेकर हाज़िर हो जाएंगे। इस बीच हम भी अक्सर बेचैन हो जाते हैं क्योंकि कुछ सूचनाएं मिलती हैं जिनके आधार पर आम निवेशक कमाई कर सकते हैं। लेकिन अर्थकाम का काम फिलहाल रुकने से हम वो सूचना आपके [...]

Jun 252012
 

अच्छी बातें किसी गाड़ी के विज्ञापित माइलेज की तरह होती हैं जो आदर्श स्थितियों में ही लागू होती हैं। उन्हें अपनी हकीकत से न मिलाया जाए तो वे महज बातें ही रह जाती हैं। इसलिए ज़िंदगी में पढ़ने व सुनने से ज्यादा गुनना जरूरी है। (more…)

Jun 242012
 

अपने तक सीमित। खूंटे से बंधी ज़िंदगी। परोक्ष रूप से तंतुओं के तंतु भले ही ग्लोबल हो गए हों, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से रिश्ते बहुत सिकुड़ गए हैं। ऐसे में हांकनेवालों की मौज है क्योंकि किसी को सिर उठाकर उनकी तरफ झांकने की फुरसत ही नहीं है। (more…)

Jun 232012
 

कुछ भी पूर्ण नहीं। कुछ भी अंतिम नहीं। इसलिए पुराने आग्रहों से चिपके रहने का कोई फायदा नहीं। नए को लपाक से पकड़ लें। पुराना उसमें सुधरकर समाहित हो जाएगा। पुराने को पकड़े रहे तो नया भरे हुए प्याले से बाहर ही छलकता रहेगा। (more…)

Jun 222012
 

जिंदगी में हमेशा बच्चे रहे। जुबान के हमेशा कच्चे रहे। सोच में हमेशा लुच्चे रहे। हर किसी को अपने आगे टुच्चा समझते रहे। ऐसे में दुनिया क्या खाक सधेगी? अपने में ही डूबे रहे और जमाने को देखा-भाला नहीं तो वह भाव दे भी तो भला कैसे! (more…)

Jun 212012
 

शरीर अपना काम करीने से करता है। मगर हम उसकी व्यवस्था में खलल डालते हैं तो लड़खड़ाने लगता है। दवा से मदद करना अच्छा है। लेकिन दारू या तंबाकू तो शरीर की धमनियों तक को झकझोर डालते हैं। इसलिए उनसे तौबा ही बेहतर है। (more…)