इस ज़माने में पैरों से नीचे की ज़मीन इतनी तेज़ी से खिसक रही है कि अपनी सुध खुद नहीं ली तो दूसरे को आपकी परवाह की फुरसत नहीं। न सरकार को जनता की सुध है और न ही संतों को। यहां तो हर किसी को अपनी ज़मीन बचाने की पड़ी है। (more…)
Jul 092012
इस ज़माने में पैरों से नीचे की ज़मीन इतनी तेज़ी से खिसक रही है कि अपनी सुध खुद नहीं ली तो दूसरे को आपकी परवाह की फुरसत नहीं। न सरकार को जनता की सुध है और न ही संतों को। यहां तो हर किसी को अपनी ज़मीन बचाने की पड़ी है। (more…)