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जीएसटी: आला रे आला, गड़बड़झाला

Jul 022017
 

गंगा नगर से ईटा नगर और लेह से लक्षद्वीप तक छोटे-बडे सभी व्यापारी व कारोबारी परेशान हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जिस माल व सेवा कर या जीएसटी को ‘गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स’ की जगह ‘गुड एंड सिम्पल टैक्स’ बता रहे हैं, व्यापारी तबका उसे ‘गड़बड़ सड़बड़ टैक्स’ कह रहा है। दोनों में से सही कौन है? इसके जवाब में धूमिल की सीख याद आती है कि लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है।

हालांकि यह भी सच है कि 1978 में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एल के झा की समिति की रिपोर्ट आने के बाद चालीस साल की मेहनत और राजनीतिक रगड़-धगड़ के बाद देश ने जीएसटी के रूप में जो मंज़िल हासिल की है, उसे किसी भी सूरत में कम नहीं आंका जा सकता। मॉडिफायड वैल्यू एडेड टैक्स (मॉडवैट) और वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) से होते हुए अंततः 17 तरह के टैक्स और 23 सेस को खत्म कर ‘एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाज़ार’ तक पहुंचना कोई आसान नहीं था। ऐसे में सैद्धांतिक तौर पर देखें तो व्यापारियों का हो-हल्ला निरर्थक लगता है।

असल में जीएसटी किसी भी अप्रत्यक्ष या परोक्ष कर की तरह अंतिम उपभोक्ता या ग्राहक से वसूला जानेवाला टैक्स है। इसमें व्यापारी को सरकार तक टैक्स को पास-ऑन करने की ही भूमिका निभानी है। सरकार ने नई व्यवस्था में इसे सुनिश्चित करने का पूरा इंतज़ाम किया है। व्यापार की हर कड़ी में पिछली कड़ी द्वारा दिए गए टैक्स का क्रेडिट देकर व्यापारी को टैक्स पर टैक्स देने के बोझ से मुक्त किया है। साथ ही फॉर्म-सी जैसी तमाम झंझटें खत्म कर दी गई हैं। इसलिए व्यापारी तबके को तो खुश होना चाहिए कि उसे अब पहले की तुलना में काफी कम टैक्स देना पड़ेगा। फिर भी अगर वो सकबकाया हुआ है तो इसकी एक वजह यह हो सकती है कि जो व्यापारी अभी तक एमआरपी में शामिल टैक्स को सरकारी खज़ाने में न जमाकर अपने मुनाफे का हिस्सा बना लेता था, वह अब शायद ऐसा नहीं कर पाएगा।

हमें एक बात और समझ लेनी चाहिए कि जीएसटी मूलतः व्यापारियों या जनता के कल्याण का नहीं, बल्कि सरकारी खजाने को भरने का उपाय है। इसके तीन मुख्य मकसद हैं। एक, टैक्स देनेवालों की संख्या या आधार को बढ़ाना। दो, देश भर में एक ही उत्पाद पर अलग-अलग टैक्स की विषमता को खत्म कर एकल राष्ट्रीय बाज़ार की स्थापना करना। और तीन, टैक्स लगाने में केंद्र और राज्यों की संविधान सम्मत शक्तियों को ध्यान में रखते हुए टैक्स संग्रह व वितरण की व्यवस्था करना ताकि को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म को मजबूत किया जा सके।

इस मकसद की गंभीरता और पवित्रता से कोई इनकार नहीं कर सकता। फिर भी देश का व्यापारी क्यों इसके खिलाफ है? आखिर कंप्यूटर हार्डवेयर से लेकर कपड़ा व किराना व्यापारी तक क्यों सड़कों पर उतर आए हैं? यह मानने का कोई तुक नहीं कि नफे-नुकसान को लेकर एकदम चौकन्ना रहनेवाला व्यापारी तबका इतना मूर्ख है कि अपना ही फायदा नहीं समझ पा रहा। दरअसल, मूल समस्या यह है कि अंग्रेज़ों के ज़माने से चली आ रही नौकरशाही ने जीएसटी जैसी सीधी-सरल व आसान कर प्रणाली को ऐसे मकड़जाल में उलझा दिया है कि छोटे-बड़े सभी व्यापारियों का माथा घूम गया है। उन्हें लगता है कि टैक्स क्रेडिट पाने के लिए इनवॉयस का मिलान करने और साल भर में 37 टैक्स रिटर्न भरने में उनका कचूमर निकल जाएगा।

इसमें अन्य कैसी-कैसी तमाम जटिलताएं है, इसे समझने के लिए दो उदाहरण काफी हैं। अगर कोई माल या सेवा जीएसटी से मुक्त है तो उसका व्यापारी उसकी पिछली कड़ियों में अदा किए गए टैक्स का क्रेडिट नहीं पा सकता। वहीं, अगर उस पर शून्य जीएसटी है तो उसे पिछला सारा टैक्स वापस मिल जाएगा। दूसरा उदाहरण है इनवॉयस की मैचिंग का। जीएसटी की पूरी आत्मा इनपुट टैक्स क्रेडिट में निहित है। मान लीजिए कि किसी सप्लायर ने दस लोगों को माल बेचा और इसमें से अगर एक ने भी दो-चार रुपए नहीं भरे तो दस में किसी को भी इनपुट टैक्स का क्रेडिट नहीं मिलेगा। जिस तरह कुंडली के 32 के 32 गुणों के मिलान पर शादी होती है, उसी तरह इनवॉयस की पूरी मैचिंग नहीं हुई तो व्यापारी को टैक्स क्रेडिट नहीं मिलेगा।

दुनिया में कहीं भी जीएसटी में इनवॉयस मैचिंग का प्रावधान नहीं है। सत्तर व अस्सी के दशक दक्षिण कोरिया, चीन व ब्राज़ील ने इसे आजमाया था। लेकिन उन्होंने फौरन इसे छोड़ दिया। फिर भी हमारे अफसर कहते हैं कि उनके बनाए जीएसटी नेटवर्क में हर महीने 350 करोड़ इनवॉयसों को हैंडल करने की क्षमता है। सवाल उठता है कि हमारा करदाता व्यापारी अभी साल में 350 इनवॉयस भी नहीं बनाता, उसे कैसे तैयार किया जाए? जीएसटी के लिए यकीनन सरकार और उसका तंत्र पूरी तरह तैयार है, लेकिन क्या इसके लिए व्यापार व कारोबार जगत तैयार है? इसी सवाल के जवाब में छिपा है लेह से लक्षद्वीप और गंगानगर से ईटानगर तक के व्यापारियों के आक्रोश का कारण व निवारण।

[यह लेख सपांदित रूप में 2 जुलाई 2017 को दैनिक जागरण के मुद्दा पेज़ पर छप चुका है]

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