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दरक गया भरोसा, सरका है सरोकार

Feb 262018
 

निवेश की दुनिया में भारत ही नहीं, समूचे विश्व में सरकारी बांडों को सबसे सुरक्षित व रिस्क-फ्री माना जाता है। आम भारतीयों के बीच सरकारी बैंकों को भी कमोबेश यही दर्जा हासिल है। लोग सरकारी बैंकों में पैसा रखकर निश्चिंत हो जाते हैं। यही वजह है कि आज भी बैंकों की कुल जमाराशि का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा सरकारी बैंकों का है। लेकिन देश के तीसरे और सरकारी क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक, पंजाब नेशनल बैंक के ताजा प्रकरण ने आम लोगों के भरोसे को झकझोर दिया है। यह भरोसा एक बार टूट गया तो उसे जोड़ना मुश्किल हो जाएगा।

वैसे, इसमें दरकन शुरू हो चुकी है। रिजर्व बैंक के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2017 की तिमाही में सरकारी बैंकों की जमाराशि साल भर पहले की तुलना में 6.9 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि निजी बैंकों की जमाराशि इसी दौरान 14.6 प्रतिशत बढ़ी है। यही नहीं, धंधे में भी सरकारी बैंक पिटने लगे हैं। उक्त अवधि में सरकारी बैंकों द्वारा दिया गया ऋण 2.1 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि निजी बैंकों ने पहले से 19.6 प्रतिशत ज्यादा उधार दिया है। दरअसल, सरकारी बैंकों, खासकर उसके शीर्ष प्रबंधन में एक तरह की अहमन्यता आ गई है कि सरकार अपना स्वामित्व बनाए रखने के लिए उन्हें बराबर पूंजी देती रहेगी और जब तक उन्हें राजनीतिक प्रश्रय मिला हुआ है, तब तक भले ही धंधा डूबता रहे, कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सोचिए, ऐसा तब हो रहा है जब भारतीय स्टेट बैंक समेत कुल 22 सरकारी बैंकों में 21 बैंक शेयर बाजार में लिस्टेड हैं जहां कामकाज में पूरी पारदर्शिता बरतना नौतिक दायित्व नहीं, बल्कि नियामक अनिवार्यता है।

अरसे से बैंकों की कर्मचारी और अधिकारी यूनियनें मांग करती रही हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक को 500 करोड़ रुपए से ज्यादा के डिफॉल्टरों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। बहुतेरे सामाजिक कार्यकर्ता भी इस पर आरटीआई कर चुके हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में जा चुका है। फिर भी रिजर्व बैंक डिफॉल्टरों के विश्वास-हनन और आरबीआई एक्ट, 1934 के सेक्शन 35-ए का हवाला देते हुए ऐसी जानकारी देने से बचता रहा है। यह अलग बात है कि रिजर्व बैंक ने बैंकिंग उद्योग की मांग पर सिबिल जैसे क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो को बैंक ऋण न चुकाने वालों की जानकारी पाने और सार्वजनिक करने की इजाज़त दे रखी है तो बकायेदारों की असलियत खुल जाती है।

फिर भी स्पष्ट जवाबदेही के अभाव में राजनीतिक संरक्षण ने सरकारी बैंकों को कुछ ज्यादा ही मनबढ़ बना दिया है। कनेक्शन वाले कॉरपोरेट क्षेत्र को वे बड़ी आसानी से बड़े-बड़े ऋण दे देते हैं। कॉरपोरेट क्षेत्र या तो जान-बूझकर इनका ऋण वापस नहीं लौटाता या अटका देता है। साल 2013 से सितबंर 2017 के बीच सरकारी बैंकों के जान-बूझकर न लौटाए गए ऋण 25,410 करोड़ रुपए से लगभग तीन गुना बढ़कर 93,357 करोड़ रुपए हो चुके हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सरकारी बैंकों के डूबत ऋणों का 65 से लेकर 83 प्रतिशत हिस्सा कॉरपोरेट क्षेत्र  का है। 2013 में बने भारतीय महिला बैंक का हाल तो यह है कि उसके 54.99 करोड़ रुपए के डूबत ऋण में से 50 करोड़ रुपए यानी 90.93 प्रतिशत हिस्सा कॉरपोरेट क्षेत्र ने डुबाया है।

जब अव्यावसायिक फैसलों के चलते सरकारी बैंकों की वित्तीय सेहत बिगड़ जाती है तो वे सरकार के सामने हाथ खड़े कर देते हैं और मालिक होने के नाते सरकार को जनता के टैक्स का धन देकर उन्हें बचाना पड़ता है। सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 2008-09 से 2016-17 के बीच बाहर से 1.19 लाख करोड़ रुपए की पूंजी डाल चुकी है। इसके ऊपर से 2.11 लाख करोड़ रुपए और डालने की घोषणा की गई है। इसमें से 88,139 करोड़ रुपए की पहली किश्त देने की व्यवस्था भी हो चुकी है। लेकिन करदाताओं के धन से सरकारी बैकों की अकर्मण्यता की भरपाई करना कहां तक सही है? वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है, “हमारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। इसलिए हमें कठिन रास्ता अपनाना पड़ा। हालात पटरी पर आते नज़र आ रहे हैं। लेकिन चुनौतियां भी फिर से उभर रही हैं।”

ऐसे में हल्ला मचाया जा रहा है कि सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। लेकिन क्या निजी हाथों में सौंप देने या करदाता का धन लगाते रहने से सरकारी बैंकों का उद्धार हो सकता है? अंतिम फैसला हमारे नीति-नियामकों को करना है। लेकिन दो सुझावों पर वे गौर कर सकते हैं। एक, सरकारी बैंकों के निदेशक बोर्ड में रिजर्व बैंक के प्रतिनिधियों को रखना तत्काल बंद किया जाए। रिजर्व बैंक सालों से इसकी मांग करता रहा है क्योंकि इससे उसे नियामक दायित्व निभाने में अड़चन आती है। दो, इन बैंकों को कॉरपोरेट क्षेत्र से पूरी तरह निकालकर केवल सरकार या प्राथमिक क्षेत्र व रिटेल ऋणों तक बांध दिया जाए जहां या तो डिफॉल्ट होता नहीं और होता भी है तो सरकार उसे चुकाने का इंतज़ाम कर देती है।

[यह लेख 24 फरवरी, 2018 को दैनिक जागरण के मुद्दा पेज़ पर छप चुका है]

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