न तुम अंतिम हो, न वह और न ही मैं। हम सब बूंद हैं, कड़ियां हैं अनंत सागर की। यहां कुछ भी सपाट नहीं, सब गोल है। चलते-चलते आखिरकार हम वहीं पहुंच जाते हैं, जहां से यात्रा की शुरुआत की थी।और भीऔर भी

परदादा से नाती तक की कड़ियां अगर जुड़ी रहें तो नाती को बाप-दादा से लेकर परदादा तक की उम्र लग जाती है और वह दीर्घायु हो जाता है। इसी निरंतरता को हम चाहें तो अपनी लंबी उम्र का सूत्र बना सकते हैं।और भीऔर भी