फकीर बोला, “मुझमें, तुझमें कोई फर्क नहीं। बस, समय और फासले का फेर है। मैं सच तक पहुंच चुका हूं, जबकि तू अभी रास्ते में हैं। तू भी यहां पहुंचकर वही बोलेगा। फिर बहस क्यों? जिरह का क्या तुक!”और भीऔर भी

परिवार के लिए आप यकीनन मूल्यवान हैं। लेकिन अपना सच्चा सामाजिक मूल्य समझना हो तो बस इतना सोचकर देखें कि आपके बिना यह दुनिया कैसे चलती है और आपके न होने से कितना फर्क पड़ेगा।और भीऔर भी

कोई भी फर्क मामूली नहीं। ज़रा-सा फर्क मूल प्रकृति बदल देता है। कोशिका के 46 में से एक क्रोमोज़ोम के अंतर से पुरुष स्त्री बन जाता है। इसलिए बारीक अंतरों को कतई नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।और भीऔर भी

बहुत कम लोग हैं जिन पर देश-दुनिया का फर्क पड़ता है। इनमें से भी ज्यादातर लोग भावना में बहकर पूरा सच नहीं देख पाते, गुमराह हो जाते हैं। स्वार्थ में धंसे दुनियादार लोग उन पर हंसते है, तरस खाते हैं।और भीऔर भी

आप खुद को कितना भी बडा़ तोप-तमंचा समझते रहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं और यह सोच खुद नहीं बनती, सायास बनानी पड़ती है।और भीऔर भी