सरस्वती ही नहीं, हैं लक्ष्मी भी नदारद!
जब बजट के एक दिन पहले आई आर्थिक समीक्षा में सितंबर 2014 में ज़ोर-शोर से शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ योजना में संशोधन कर ‘असेम्बल इन इंडिया’ जोड़ दिया गया, तभी सकेत मिल गया था कि सरकार का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने का इरादा अब ढीला पड़ गया है। सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना शुरू करते वक्त लक्ष्य रखा था कि देश के जीडीपी में इसका योगदान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 2022 तक 25औरऔर भी
जापान महंगाई बढ़ाने के लिए बेताब
बैंक ऑफ जापान अपने यहां मुद्रास्फीति को बढ़ाकर 2% कर देना चाहता है। इसके लिए वह नोटों की सप्लाई को दोगुना करने जा रहा है। वहां इस साल फरवरी में मुद्रास्फीति की दर बढ़ने के बजाय 0.70% घटी है। वह भी तब, जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं, रहने के खर्च, परिवहन व संचार और संस्कृति व मनोरंजन का भार 71.5% (25 + 21 + 14 +11.5) है, जबकि ईंधन, बिजली व पानी का 7%, मेडिकलऔरऔर भी
लूट सके तो लूट!
जब किसी सेवा या उद्योग का मूल मकसद मुनाफे को महत्तम करना हो जाए तो उससे इंसानी सरोकारों के कद्र की उम्मीद बेमानी है। मुनाफे की यह दौड़ भिखारी तक की जेब से दमड़ी निकाल लेती है तो बाकियों का लुटना एकदम स्वाभाविक है।और भीऔर भी
एक कदम पीछे, दो कदम आगे, प्रणब के पिटारे से निकले जादू का इंतज़ार
घटती विकास दर की हकीकत और आगे बढ़ जाने की उम्मीद के बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी देश का 81वां आम बजट शुक्रवार को संसद में पेश कर रहे हैं। आम नौकरीपेशा लोगों को उम्मीद है कि आयकर छूट की सीमा 1.80 लाख से बढ़ाकर 3 लाख रुपए की जा सकती है तो कॉरपोरेट क्षेत्र को लगता है कि एक्साइज ड्यूटी को 10 से 12 करके उनको पहले दी गई राहत वापस ले ली जाएगी। वहीं अर्थशास्त्रीऔरऔर भी
बैंकों से उद्योग को मिले ऋण ने सुस्ती की पुष्टि की, 19.67% घट गई बढ़त
इसे बढ़ी हुई ब्याज दरों का असर कहें या औद्योगिक सुस्ती का नतीजा, लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि इस साल औद्योगिक क्षेत्र को बैंकों से मिले ऋण में अभी तक पिछले साल के मुकाबले 55,138 करोड़ रुपए कम बढ़त हुई है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 4 नवंबर तक बैंकों द्वारा दिया गया गैर-खाद्य ऋण या दूसरे शब्दों में मैन्यूफैक्चरिंग व उपभोक्ता क्षेत्र को दिया गया ऋण 2,25,211 करोड़ रुपए बढ़ा है, जबकि बीते वित्त वर्ष 2010-11औरऔर भी





