भारतीय शेयर बाज़ार में पिछले डेढ़ महीने में किसी एक दिन में ऐसी तल्ख गिरावट नहीं आई थी। सेंसेक्स कल 1.21% और निफ्टी 1.36% गिर गया। डर है कि मंगल को देर रात से शुरू हुई दो दिनी बैठक में अमेरिकी फेडरल रिजर्व कहीं समय से पहले ब्याज दर बढ़ाने का फैसला न कर ले। इस आशंका में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने मुनाफावसूली शुरू कर दी है। क्या हैं, इस बिकवाली के मायने? समझते हैं आगे…औरऔर भी

राकेश झुनझुनवाला ने कुछ हफ्ते पहले बोला कि भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी का ऐसा लंबा दौर आ रहा है जैसा अमेरिका में 1982 से 2000 तक चला था। लेकिन तब अमेरिका में बिजनेस का बेहद माकूल माहौल था। वहीं भारत अभी बिजनेस करने की आसानी में दुनिया के 189 देशों में 134वें, बिजनेस शुरू करने में 179वें और कांट्रैक्ट लागू करने में 186वें नंबर पर है। बिजनेस नहीं तो बाज़ार कैसे बढ़ेगा? अब मंगलवार की धार…औरऔर भी

अक्सर बेहद छोटी-छोटी बातें हमें उलझाए रखती हैं। जैसे, अपने एक सबसक्राइबर ने ई-मेल से काफी पहले पूछा था कि स्विंग या मोमेंटम ट्रेड कैसे करें क्योंकि उनका ब्रोकर केवल इंट्रा-डे ट्रेड की ही सुविधा देता है। इतनी देर से जवाब देने के लिए मैं उनसे माफी चाहता हूं। मेरा कहना है कि नाम में न जाएं। स्विंग या मोमेंटम सामान्य खरीद-फरोख्त के ही सौदे हैं। खरीदा और पांच-दस दिन बाद बेच दिया। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बात बड़ी सीधी है। मांग सप्लाई से ज्यादा तो भाव बढ़ते हैं और सप्लाई मांग से ज्यादा तो भाव गिरते हैं। सामान्य बाज़ार का यह सामान्य नियम शेयर बाज़ार पर भी लागू होता है। कुशल ट्रेडर का काम है ठीक उस बिंदु को पकड़ना, जब मांग-सप्लाई में सर्वाधिक असंतुलन हो। इसी बिंदु से शेयरो के भाव पलटी खाते हैं और यही मौका होता है न्यूनतम रिस्क में अधिकतम कमाई करने का। यही सूत्र पकड़कर बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

रामचरित मानस की यह चौपाई याद कीजिए कि मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोधि के लगन धरी, सीताहरण मरण दशरथ को, वन में विपति परी। जीवन और बाज़ार की यही खूबसूरती है कि वह बड़े-बड़े विद्वानों की भी नहीं सुनता। जहां लाखों देशी-विदेशी निवेशकों का धन-मन लगा हो, भाव हर मिनट पर बदलते हों, वहां बाज़ार को मुठ्ठी में करने का दंभ भला कैसे टिकेगा! इसलिए फायदे के साथ रखें घाटे का हिसाब। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

हर दिन सैकड़ों शेयर बढ़ते हैं, सैकड़ों गिरते हैं। जैसे, कल एनएसई में 677 शेयर बढ़े तो 481 गिरे। इन सभी में ट्रेडिंग के अवसर थे। लेकिन कौन बढ़ा, कौन घटा, यह हो जाने के बाद पता चलता है। हमें इन अवसरों को पहले पकड़ना होता है ताकि अपनी पूंजी बढ़ा सकें। हर ट्रेडर अपनी रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से शेयर चुनता है। लेकिन हमारा मकसद होना चाहिए न्यूनतम रिस्क में अधिकतम रिटर्न। अब आज का बाज़ार…औरऔर भी

क्या शेयर बाज़ार शुद्ध सट्टा है? हमारे तमाम सांसद यही मानते हैं। इसलिए वे नहीं चाहते कि पेंशन स्कीम का फंड शेयरों में लगे। नए लोगों को लगता है कि ट्रेडिंग में जबरदस्त थ्रिल व एडवेंचर है और यहां आसानी से नोट बनाए जा सकते हैं। जितना रिस्क, उतना रिटर्न! लेकिन हकीकत यह है कि थ्रिल, एडवेंचर और रिस्क उठानेवाले ट्रेडिंग में हमेशा मुंह की खाते हैं। प्रोफेशनल ट्रेडर रिस्क नहीं लेता। अब करें बाज़ार का रुख…औरऔर भी

हर दिन बाज़ार से घनेरों सूचनाएं निकलती हैं। इनमें से काम की सूचना निकालना और विश्लेषण करना कठिन है। फिर तमाम संकेतकों में इन्हें बैठा कर किसी नतीजे पर पहुंचना कठिन है। स्टॉक एनालिस्ट बनना भी कठिन है, बशर्ते यह नौकरी कहीं न मिल जाए। लेकिन ट्रेडिंग करना और भी कठिन है। चार्ट बना लिया। पर चार्ट का दाहिना हिस्सा खाली है। इसे भरने का हुनर अनुभव, अध्ययन, अभ्यास व अनुशासन से आता है। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

यूं तो ज्यादातर ट्रेडर हाई ब्लड-प्रेशर के शिकार होते है। लेकिन उत्तेजना में जीनेवाले ट्रेडर ज्यादा टिकते नहीं। लाभ-हानि दोनों ही अवस्था में जो शांत रहते हैं, वही टिकते हैं। सौदे में बड़ी कमाई से चहकनेवाले ट्रेडर उस वकील जैसे हैं जो मुकदमे के बीच ही नोट गिनने लगता है। वहीं घाटा खाकर लस्त पड़नेवाले ट्रेडर उस सर्जन जैसे हैं जो ऑपरेशन टेबल पर मरीज का खून देखकर बेहोश हो जाता है। अब बाज़ार पर शांत नज़र…औरऔर भी

सौ कमाया। सौ गंवाया। रकम बराबर तो कमाने की खुशी और गंवाने का दुख बराबर होना चाहिए। लेकिन हम-आप जानते हैं कि सौ रुपए गंवाने की तकलीफ सौ रुपए कमाने की खुशी पर भारी पड़ती है। इसे निवेश की दुनिया में घाटे से बचने की मानसिकता कहते है। 100 गंवाने का दुख 200 कमाने के सुख से बराबर होता है। इसलिए स्टॉप-लॉस और लक्षित फायदे की लाइन छोटी-बड़ी होती है। मनोविज्ञान का खेल है ट्रेडिंग। अब आगे…औरऔर भी