सवाल यह है कि जब हमारे जीडीपी की रीयल विकास दर बम-बम कर रही है, 2025-26 में अंतिम से ठीक पहले के अनंतिम अनुमान के मुताबिक वो 7.7% रही है और इससे पहले वित्त वर्ष 2023-24 में जीडीपी 7.2% और 2024-25 में 7.1% बढ़ा है, तब विदेशी निवेशक और देशी-विदेशी कंपनियां भारत छोड़कर भाग क्यों रही हैं? चालू खाते के घाटे के साथ ही पूंजी खाता इस कदर क्यों घाटे में आ रहा है कि भुगतान संतुलनऔरऔर भी

देश में विदेशी मुद्रा का संकट चल रहा है। कहने को देश में आया प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) बीते वित्त वर्ष 2025-26 में 94.53 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। लेकिन विदेशी और देशी कंपनियां जितनी विदेशी मुद्रा बाहर ले जा रही हैं, उसे घटाने के बाद शुद्ध एफडीआई मात्र 7.65 अरब डॉलर रह गया। अनिवासी भारतीयों तक ने इस साल मार्च में भारतीय बैंकों से 1.93 अरब डॉलर की डिपॉजिट निकाल ली। विदेशी पोर्टफोलियोऔरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद बड़ी आशा व उम्मीद के साथ भारतीय शेयर बाज़ार में वित्त वर्ष 2015-16 से 2023-24 तक शुद्ध रूप से 50.5 अरब डॉलर का निवेश किया। इसमें से अकेले 37.03 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में किया। उसके बाद धीरे-धीरे उनकी आशा निराशा में बदलती गई। वो भी तब, जब 2022-23 को आधार वर्ष बनाने के बादऔरऔर भी

सरकार को खुश करने और माहौल बनाने के लिए रिजर्व बैंक भी झांसा देने में माहिर हो गया है। रिजर्व बैंक की आकस्मिक निधि या कन्टेंजेंसी फंड (सीएफ) 2023-24 से 2024-25 के बीच ₹1,13,805.93 करोड़ बढ़ाकर ₹4,28,621.03 करोड़ से ₹5,42,426.96 करोड़ कर दी गई। इस बार इसे मात्र ₹25,096.23 करोड़ बढ़ाकर 5,68,333.19 करोड़ किया गया है। फिर भी रिजर्व बैंक की विज्ञप्ति में बताया गया है कि ‘वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिदृश्य’ के मद्देनज़र इस बार सीआरबीऔरऔर भी

पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में रिजर्व बैंक बैंक की बैलेंस शीट ₹76,25,421.93 करोड़ थी। तब उसने इसका 7.5% हिस्सा कंटिन्जेंट रिस्क बफर (सीआरबी) में डाला था। यह रकम 5,71,906.64 करोड़ रुपए थी। बीते वित्त वर्ष 2025-26 में रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट 20.6% बढ़कर ₹91,97,121.08 करोड़ हो गई। पश्चिम एशिया संकट के चलते अर्थव्यवस्था जिस तरह दबाव में है और रुपया लगातार कमज़ोर हो रहा है, उसमें सीआरबी को घटाने का कोई तुक नहीं था। फिर भीऔरऔर भी

इस बार रिजर्व बैंक से ₹2,86,588 करोड़ का रिकॉर्ड लाभांश वसूल करने में मोदी सरकार ने हद दर्जे की चालाकी बरतते हुए देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। यह फैसला वैसे तो रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में उसके केंद्रीय बोर्ड ने लिया है। लेकिन सारा देश जानता है कि मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक से लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक में शीर्ष पदों पर अपने पिट्ठू बैठाऔरऔर भी

भाजपा अपनी विभाजक राजनीति के दम पर केंद्र से लेकर राज्यों तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक सत्ता पर कब्जा करती गई। लेकिन उसकी राजनीति का मूल मकसद है जनधन या टैक्स के अकूत खजाने को खर्च करने का अबाधित अधिकार हासिल करना। टैक्स का खज़ाना तब तक नहीं बढ़ सकता, जब तक अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ती। मगर राजनीतिक सत्ता ही नहीं रही तो टैक्स का खजाना मिल नहीं सकता। इन दो विपरीत तत्वों को साधने के लिएऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था और विभाजक राजनीति में व्युत्क्रमानुपाती या उल्टा रिश्ता होता है। एक का बढ़ना दूसरे के लिए घातक है। विभाजक राजनीति बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था का घटना तय है। इस सच को झुठलाने के लिए ही मोदी सरकार ने पहले ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया। इस नारे पर लोगों का विश्वास टूटने लगा तो उसने इसमें ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया। वो कथनी में हमेशा समावेशी विकास की बातें करती रही। लेकिन करनी में व्यापक अवामऔरऔर भी

निवेश हमेशा भविष्य के लिए किया जाता है, अभी के लिए नहीं। यह भविष्य दो-चार साल से लेकर 10-20 साल भी हो सकता है। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह कोई अभी से जान या बता नहीं सकता। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं और ब्रोकर, सब-ब्रोकर और एजेंट टाइप लोग ऐसी कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से काफी बढ़े हुए हैं। लोगबाग भी लालच में इनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन सवाल उठता हैऔरऔर भी

भारत के पास प्रतिभा है, मांग है और व्यापक डिजिटल तंत्र है। लेकिन भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में इन मजबूत पहलुओं को समाहित करने की सामर्थ्य तो छोड़िए, नीयत तक नहीं है। वे तो भारत छोड़ बाहर निवेश करते जा रहे हैं। यही वजह है कि एफडीआई के रूप में देश में जितनी पूंजी आ रही है, कमोबेश उतनी ही भारतीय पूंजी बाहर निकल जा रही है तो शुद्ध एफडीआई की स्थिति दयनीय है। अनिवासी भारतीयों तक नेऔरऔर भी