इस बार रिजर्व बैंक से ₹2,86,588 करोड़ का रिकॉर्ड लाभांश वसूल करने में मोदी सरकार ने हद दर्जे की चालाकी बरतते हुए देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। यह फैसला वैसे तो रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में उसके केंद्रीय बोर्ड ने लिया है। लेकिन सारा देश जानता है कि मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक से लेकर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक में शीर्ष पदों पर अपने पिट्ठू बैठाऔरऔर भी

भाजपा अपनी विभाजक राजनीति के दम पर केंद्र से लेकर राज्यों तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक सत्ता पर कब्जा करती गई। लेकिन उसकी राजनीति का मूल मकसद है जनधन या टैक्स के अकूत खजाने को खर्च करने का अबाधित अधिकार हासिल करना। टैक्स का खज़ाना तब तक नहीं बढ़ सकता, जब तक अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ती। मगर राजनीतिक सत्ता ही नहीं रही तो टैक्स का खजाना मिल नहीं सकता। इन दो विपरीत तत्वों को साधने के लिएऔरऔर भी

अर्थव्यवस्था और विभाजक राजनीति में व्युत्क्रमानुपाती या उल्टा रिश्ता होता है। एक का बढ़ना दूसरे के लिए घातक है। विभाजक राजनीति बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था का घटना तय है। इस सच को झुठलाने के लिए ही मोदी सरकार ने पहले ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया। इस नारे पर लोगों का विश्वास टूटने लगा तो उसने इसमें ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया। वो कथनी में हमेशा समावेशी विकास की बातें करती रही। लेकिन करनी में व्यापक अवामऔरऔर भी

निवेश हमेशा भविष्य के लिए किया जाता है, अभी के लिए नहीं। यह भविष्य दो-चार साल से लेकर 10-20 साल भी हो सकता है। लेकिन भविष्य में क्या होगा, यह कोई अभी से जान या बता नहीं सकता। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं और ब्रोकर, सब-ब्रोकर और एजेंट टाइप लोग ऐसी कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से काफी बढ़े हुए हैं। लोगबाग भी लालच में इनके झांसे में आ जाते हैं। लेकिन सवाल उठता हैऔरऔर भी

भारत के पास प्रतिभा है, मांग है और व्यापक डिजिटल तंत्र है। लेकिन भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में इन मजबूत पहलुओं को समाहित करने की सामर्थ्य तो छोड़िए, नीयत तक नहीं है। वे तो भारत छोड़ बाहर निवेश करते जा रहे हैं। यही वजह है कि एफडीआई के रूप में देश में जितनी पूंजी आ रही है, कमोबेश उतनी ही भारतीय पूंजी बाहर निकल जा रही है तो शुद्ध एफडीआई की स्थिति दयनीय है। अनिवासी भारतीयों तक नेऔरऔर भी

सरकार और उसके अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि हमारे रुपए और शेयर बाज़ार की हालत आंतरिक नहीं, बाहरी वजहों से खराब हुई है। उसके मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन अंकटाड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते है कि 2022 के बाद ही दुनिया में विदेशी निवेश उभरते देशों से निकलकर विकसित देशों की तरफ जा रहा है। इससे भारत समेत तमाम उभरते देशों की मुद्रा और शेयर बाज़ार कमज़ोर हुए हैं। लेकिन ब्राज़ील भी तोऔरऔर भी

मोदी सरकार ने भारत की विकासगाथा को खिलने से पहले ही कैसे कुचलकर मसल दिया है, उसके कुछ पुख्ता प्रमाण। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं कि 2013 में भारत को दुनिया की पांच फ्रेज़ाइल या भंगुर अर्थव्यवस्थाओं में गिना गया था। बाकी देश थे – इंडोनेशिया, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किए। लेकिन आज दुनिया में केवल दो भंगुर अर्थव्यवस्थाएं बची हैं। एक है भारत औरऔरऔर भी

सच्चाई बड़ी बेरहम होती है। वो किसी पर कोई दया-माया नहीं दिखाती। मोदी सरकार ने बारह साल में अपने कर्मों से भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस मुकाम पर ला पटका है, वो बेहद दुखद व खतरनाक है। आगे क्या होगा, यह सोचकर ही दिलो-दिमाग सिहर जाता है। भारत की जिस विकासगाथा की चर्चा 1991 से शुरू उदारीकरण के बाद से ही की जा रही थी, वो अब धराशाई हो चुकी है। मोदी सकार भले ही 2047 तक भारतऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में जबरदस्त निराशा का आलम है। बहुत सारे बड़े-बड़े निवेशकों को लगता है कि अब भारत की विकासगाथा का अंत हो गया है। इसकी तात्कालिक वजह जहां पश्चिम एशिया में चल रही उथल-पुथल और ऊर्जा सुरक्षा पर छाया संकट है, वहीं स्थाई वजह मोदी सरकार की स्वार्थी व सत्ता केंद्रित राजनीति है। देश की सत्ता पर संघ व भाजपा का शिकंजा कसता जा रहा है। मगर अर्थव्यवस्था की हालत चॉक के टुकड़े जैसी भंगुर होतीऔरऔर भी

चीन ही नहीं, दुनिया का कोई भी देश भारत के मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश करने को तैयार नहीं है। इसके बाहरी और आंतरिक दोनों ही कारण है। सरकार को लगता है कि टैक्स में रियायत देकर विदेशी निवेश खींचा जा सकता है। लेकिन ईडी और सीबीआई के जरिए जिस तरह कंपनियों को परेशान करके वसूली की जाती है, वो सारी दुनिया को पता लग चुका है तो कोई भी कंपनी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती। हां, चीनऔरऔर भी