मई कैलेंडर

Oct 262012
 
बेकाम है निष्काम

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Sep 232012
 
मरना काहे को!

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Jul 172012
 

जो लोग सच को सूत्रों में फिट करते हैं, वर्तमान को पूरी जटिलता के साथ समझे बगैर ही बदलने की बात करते हैं, वे कोरे लफ्फाज़ हैं, क्रांतिकारी नहीं। वे समाज की चक्रवाती भंवर से निकले झाग हैं। उनसे किसी सार्थक काम की उम्मीद बेमानी है। (more…)

Jul 042012
 

इतना सारा जानकर करेंगे क्या? अगले जन्म में तो फिर सिफर से शुरू करना है! मृत्यु के इस भाव और भय से जिएंगे तो सारा ज्ञान निरर्थक लगेगा। लेकिन जीवन के हर पल को डूबकर जीना है तो ज्ञान का हर क़तरा जीने को सघन बना देगा। (more…)

Jul 032012
 

जब किसी सेवा या उद्योग का मूल मकसद मुनाफे को महत्तम करना हो जाए तो उससे इंसानी सरोकारों के कद्र की उम्मीद बेमानी है। मुनाफे की यह दौड़ भिखारी तक की जेब से दमड़ी निकाल लेती है तो बाकियों का लुटना एकदम स्वाभाविक है। (more…)

Jun 232012
 

कुछ भी पूर्ण नहीं। कुछ भी अंतिम नहीं। इसलिए पुराने आग्रहों से चिपके रहने का कोई फायदा नहीं। नए को लपाक से पकड़ लें। पुराना उसमें सुधरकर समाहित हो जाएगा। पुराने को पकड़े रहे तो नया भरे हुए प्याले से बाहर ही छलकता रहेगा। (more…)

Apr 102012
 

किसी ने कुछ कह दिया। हम बिदक गए। यूं ही प्रतिक्रिया में जीते-जीते सारी जिंदगी कट जाती है। कभी ठहरकर यह तो सोचो कि तुम्हें खुद क्या पाना है, तुम्हारी मंज़िल क्या है? फिर ये सारा फालतू उछलना-कूदना थम जाएगा। (more…)