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मुठ्ठी में मंज़िल

Feb 182012
 

इंसान अपनी मंज़िल से उतना ही दूर है, जितना दूर वो अपने कुतूहल से है। जानने की इच्छा न हो, नए से नया देखने का कौतूहल न हो तो इंसान चलता ही नहीं; और, चले बिना मंजिल भला किसे मिलती है!

  One Response to “मुठ्ठी में मंज़िल”

Comments (1)
  1. जाते हुए कहते हो कयामत को मिलेंगे,
    क्या खूब, कयामत का है गोया कोई दीं और.
    -ग़ालिब

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