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यह पहल क्यों?

 

भाषा ने एक जबरदस्त विभाजन रेखा खींच रखी है। करीब दस करोड़ लोग हैं जो अंग्रेजी में सोचते है, अंग्रेजी ही बोलते हैं। इनके लिए सारा अर्थ जगत खुला हुआ है। लेकिन हम हिंदी वालों के लिए अर्थ की दुनिया अबूझ पहेली की तरह है। इसलिए हमारी वित्तीय साक्षरता जरूरी है। दूसरे भारतीय परंपरा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में ही जीवन का संपूर्ण चक्र समाहित है। इन्हें जीवन का चार पुरुषार्थ माना गया है। इसलिए अर्थकाम आपकी वित्तीय साक्षरता ही नहीं बढ़ाएगा, वह आपको जीवन को समग्रता से समझने के साधन भी उपलब्ध कराएगा।

  6 Responses to “यह पहल क्यों?”

Comments (6)
  1. sir aap intra day ki bhi tips diya karo……………..thanks,,,,,,,,,

    aap ki site mujhe hindi mai bhaut aachi lagi……….verygood…………………….

    goodmorning.

  2. जो लोग इश्क में गहरे डूबते हैं, वे कभी बूढ़े नहीं होते। उम्र बीतने पर मरते वे भी हैं। मौत को गले लगाते वक्त भी वे जवानी के उल्लास से लवरेज रहते हैं।
    sir aap ye bath lakh Rs. ki hai
    jo log ishk karthe hai wahi jithe hai.

  3. Your every article and comments are incredible. Please keep the temp up just like that always.

  4. यह पहल क्यों? भाषा को लेकर भारतीयों में आर्थिक असमता का जैसे आपने रहस्य ही ढूंड लिया है| मेरी समझ में यह बहुत बड़ा कारण है लेकिन केवल एक ही कारण नहीं है| अंग्रेजी में लिखने, बोलने, व कार्य करने वाले भी भारत में व्यापक तौर पर उन्नत्ति नहीं कर पाते| उन्होंने भले ही समाज में अपने लिए सुरक्षित स्थान बना लिया है (अन्धों में काना राजा) लेकिन यह सब व्यक्तिगत रूप में उनके अपने लिए ही है| नेतृत्वहीन अंग्रेजी व प्रांतीय भाषांए बोलने वाले समाज को उन्नत्ति पथ पर उन उंचाईयों पर जहां प्रत्येक भारतीय बिना किसी भेद भाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक जीवन यापन कर सके ले जाने में असमर्थ हैं| मैंने पहले भी इन पन्नों पर आपकी इस सुन्दर वेबसाईट की प्रसंशा की है लेकिन जैसे जैसे समय मिलने पर आपके विचार पढ़ मुझे विश्वास हो चला है कि आप में कुशल नेतृत्व करने की क्षमता है| वर्षों से मैंने समाज के ठेकेदारों को निष्क्रिय भेड़ों को उपदेश सुनाते देखा है लेकिन आप जैसे तेजस्वी लोग उन्हें हांक कर किसी लक्ष्य पर ले जाने के प्रयत्न में लगे हैं| आप आर्थिक व्यवस्था को भलीभांति समझते हैं| क्यों न निष्कपट नेतृत्व को धंधा बना लिया जाए? व्यक्तिगत आर्थिक लाभ और राष्ट्रवाद दोनों की सांझेदारी में की गई उन्नत्ति विकासशील समाज में आदर्श व सद्भावना जगायेगी|

  5. Your initiative is laudable. That being said, you cite 10 crore people who speak/think in English, which I believe is low. According to 2001 census, over 23 crore people consider English as first/second or third language. This number has definitely grown and will show in 2011 census.

  6. बहुत खूब अनिल सिंह जी
    कृपया आगे बढ़ें, वित्तीय अज्ञानता के खिलाफ आपकी इस मुहीम में हम जैसे लोग आपके साथ हैं.

    विपिन

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